अति चिंतन
कहानी - अति-चिंतन डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली मंजू आज सुबह से ही बहुत थकी हुई महसूस कर रही थी। वैसे तो उसे नींद बहुत कम आती थी, पर आज तो आंखें खोलने का भी मन नहीं हो रहा था। पति और बच्चों को स्कूल-ऑफिस भेजकर वह बिस्तर पर जा गिरी और गिरते ही उसे नींद आ गई। बेड के ठीक सामने दीवार पर घड़ी टंगी थी। हर दस मिनट में उसकी आंख खुलती। घड़ी देखती और मन में चिंता शुरू - "अभी तो कपड़े धोने हैं, दोपहर का खाना बनाना है, बच्चों को स्कूल से लाने जाना है। मैं ऐसे कैसे सो सकती हूँ।" बस घड़ी देखती और फिर सो जाती। ऐसा पाँच-छह बार हुआ। नींद में भी उसका दिमाग शांत नहीं था। वह खुद से ही कह रही थी, "आज मुझे क्या हो गया है? इतनी नींद क्यों आ रही है? कहीं मुझे कोई बीमारी तो नहीं हो गई? इतना सारा काम पड़ा है।" अचानक उसकी आंख खुली। वह हड़बड़ाकर रसोई में काम करने गई ही थी कि पेट में एक तेज दर्द उठा। वह फिर से बेड पर आकर लेट गई। उसने धीरे से पेट को छूकर देखा कि दर्द कहाँ हो रहा है, तो उसे पेट में बाईं ओर कुछ ठोस सा महसूस हुआ। बस, यहीं से उसके अति-चिंतन की असली उड़ान शुरू हो गई। उसे डर लगने लगा। म...