गुरु गुड़ ही रहा चेला चीनी हो गया

 

कहानी -गुरु गुड़ ही रहा, चेला चीनी हो गया

लेखिका डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली 


अक्टूबर का महीना था। सुबह-शाम की हवा में हल्की ठंडक घुलने लगी थी। सूरज अभी-अभी क्षितिज के पार से झांका था और उसकी सुनहरी किरणें नदी के शांत जल पर तैर रही थीं।


नदी के किनारे एक पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर पंडित रामशरण बैठे थे। माथे पर चंदन का तिलक, चेहरे पर तेजस्वी आभा। वे अभी-अभी सूर्य को अर्घ्य देकर लौटे थे। उन्होंने अपनी पोटली से शालिग्राम के काले, चमकीले पत्थर को बड़े यत्न से निकाला, नदी के जल से उन्हें स्नान कराया और फिर चबूतरे पर एक साफ कपड़े पर विराजमान किया। उन्होंने आंखें बंद कीं, कुछ मंत्र पढ़े, प्रार्थना की और फिर अपने झोले से निकालकर भोग लगाया। अंत में थोड़ा प्रसाद स्वयं ग्रहण किया।


यह सब क्रिया कुछ दूरी पर खड़ा एक बारह वर्षीय बालक बड़ी उत्सुकता से देख रहा था। उसका नाम सूरज था। मैली-कुचैली धोती, नंगे पांव, लेकिन आंखों में गजब की चमक। वह कई दिनों से पंडित जी को यह सब करते देख रहा था। आज उसकी जिज्ञासा रोक न सकी।


वह धीरे-धीरे पंडित जी के पास गया, उसने दण्डवत प्रणाम किया और भोलेपन से बोला, "पंडित जी, मेरा नाम सूरज है। मैं आपको बहुत दिन से देख रहा हूँ। मुझे भी ऐसे भगवान जी चाहिए। कृपया मुझे भी दे दो न!"


पंडित जी ने उसकी ओर देखा और हल्के से मुस्कराए। बच्चे की सरलता पर उन्हें दया आ गई। उन्होंने कहा, "बेटा, दे तो दूंगा, लेकिन इनकी सेवा बड़ी कठिन है। रोज सुबह ब्रह्म-मुहूर्त में उठकर स्नान करना पड़ेगा। सबसे पहले इन्हें नहलाना, इनकी पूजा करनी होगी। फिर भोग लगाकर ही स्वयं कुछ खाना होगा। नियम कभी टूटना नहीं चाहिए। बिना भोग लगाए एक दाना भी मुंह में नहीं डालना है। बोलो, कर पाओगे?"


सूरज तो मानो इसी क्षण की प्रतीक्षा में था। वह पंडित जी के चरणों में गिर पड़ा और बोला, "गुरुजी! आज से आप ही मेरे गुरुजी हो! आपने जैसा कहा है, मैं वैसा ही करूंगा। प्राण जाए पर वचन न जाए।"


पंडित जी उसके भोलेपन से बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने अपने झोले में से एक काला, चमकीला शालिग्राम पत्थर निकालकर उसके हाथों में रख दिया। सूरज की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने गुरुजी के पैर छुए और उस पत्थर को अपनी छाती से लगाए दौड़ता हुआ घर पहुंचा।


घर में उसकी मां अकेली रहती थी। उसने मां को सारी बात बताई। मां ने उसकी भक्ति देखकर उसे गले लगा लिया और आशीर्वाद दिया, "जा बेटा, अपने भगवान को खुश रख।"


अगली सुबह सूरज मुंह-अंधेरे ही जाग गया। अक्टूबर की ठंड में उसने नदी में जाकर स्नान किया। ठंड से उसके दांत किटकिटा रहे थे, पर मन में उत्साह था। घर आकर उसने पंडित जी के बताए अनुसार शालिग्राम को स्नान कराया, फूल चढ़ाए, धूप दिखाई और फिर छोटी सी थाली में रोटी-सब्जी का भोग लगाकर सामने बैठ गया।


उसने हाथ जोड़कर कहा, "भगवान जी, भोग लगाओ, मुझे बहुत भूख लगी है।"


एक घंटा बीता, दो घंटे बीते। सुबह से दोपहर हो गई। थाली में रखा भोग ज्यों का त्यों था। सूरज ने सोचा, शायद भगवान जी मुझसे नाराज हैं। उसने रोते हुए विनती की, "हे प्रभु! मुझसे कोई गलती हो गई हो तो क्षमा कर दो। लेकिन कुछ तो खा लो। मैंने गुरुजी को वचन दिया है, मैं आपको भोजन कराए बिना नहीं खाऊंगा।"


दोपहर से शाम हो गई। शाम से रात घिर आई। मां ने बहुत मनाया, "बेटा, खा ले, भगवान ने खा लिया होगा।" पर सूरज टस से मस न हुआ। "नहीं मां, भोग जरा भी कम नहीं हुआ है। जब तक ये नहीं खाएंगे, मैं भी नहीं खाऊंगा।"


रात गहरी हो गई। भूखा-प्यासा सूरज भगवान की थाली के सामने ही फर्श पर सो गया।


लगभग आधी रात का समय हुआ होगा। तभी झोपड़ी में एक तेज, दिव्य प्रकाश फैल गया। सूरज की आंखें खुलीं। उसने देखा, उसकी उम्र का ही एक सांवला-सलोना बालक उसके सामने खड़ा मुस्करा रहा था। उसके चेहरे पर अद्भुत तेज था।


सूरज हड़बड़ाकर उठ बैठा, "तुम... तुम कौन हो?"


उस बालक ने हंसकर कहा, "तुम ही तो सुबह से मुझे बुला रहे थे खाने के लिए! मैं ही तुम्हारा भगवान हूँ। मैं बालक का भेष बदलकर आया हूँ, ताकि और कोई मुझे पहचान न ले। आओ, अब साथ में खाना खाते हैं। मुझे भी बड़ी भूख लगी है।"


सूरज की आंखों में आंसू आ गए, पर उसने जिद पकड़ ली। "पहले वचन दो! तुम्हें अब रोज एक बार बुलाने पर ही आना पड़ेगा।"


उस बालक, श्याम ने उसके गाल पर चपत लगाई और कहा, "अच्छा बाबा, ठीक है! कल से एक बार बुलाने पर ही आ जाऊंगा। पक्का वादा!"


उस रात दोनों ने साथ बैठकर भोजन किया। कैसा अद्भुत स्वाद था उस भोग में!


अगले दिन से तो जैसे सूरज की दुनिया ही बदल गई। भगवान श्याम रोज बालक के रूप में आते। दोनों साथ खाना खाते, साथ गाय चराने जाते, साथ खेलते। सूरज अब बहुत खुश रहने लगा था। लेकिन एक रहस्य था - वह श्याम सिर्फ सूरज को ही दिखाई देता था, और किसी को नहीं।


एक दिन खेलते-खेलते सूरज को वही पंडित जी बाजार में दिखाई दे गए। उसने उन्हें तुरंत पहचान लिया। उसने श्याम से कहा, "श्याम, तुम मेरी गाय का ध्यान रखना। मैं अपने गुरुजी को धन्यवाद बोलकर आता हूँ। उनकी वजह से ही तुम मुझे मिले हो।"


श्याम हल्के से मुस्कराया और उसने हां में सिर हिला दिया।


सूरज दौड़कर पंडित जी के पास पहुंचा और उनके पैरों में दण्डवत प्रणाम किया। बोला, "गुरुजी, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद! आपने मुझे श्याम से मिलवाया।"


पंडित जी को लगा कि लड़का पगला गया है। उन्होंने अविश्वास से कहा, "कौन श्याम? कैसा श्याम?"


सूरज ने जिद की, "मेरे भगवान जी! वो रोज मेरे साथ खाते हैं, खेलते हैं।"


पंडित जी ने हंसकर कहा, "अच्छा? तो मुझे भी मिलवाओ न अपने भगवान जी से!"


सूरज ने बड़ी उत्सुकता से एक ओर इशारा करते हुए कहा, "वो देखो! वो रहा मेरा दोस्त श्याम! रोज मेरे साथ खाना खाता है, गाय चराने जाता है।"


पंडित जी ने उस दिशा में देखा। वहां कोई नहीं था। सिवाय एक गाय के। उन्होंने कहा, "बेटा, मुझे तो कुछ दिखाई नहीं दे रहा। कहां है तुम्हारा श्याम?"


सूरज उदास हो गया। "गुरुजी, वो आपको दिखाई नहीं दे रहे?"


"नहीं बेटा, मुझे तो कोई नहीं दिख रहा।"


सूरज ने कहा, "आओ मेरे साथ।" वह पंडित जी का हाथ पकड़कर श्याम के पास ले गया और बोला, "मित्र श्याम, ये वही पंडित जी हैं, जिन्होंने मुझे तुमसे मिलवाया था। ये मेरे गुरुजी हैं। पर इन्हें तुम दिखाई नहीं दे रहे। ये मुझे झूठा समझ रहे हैं। अच्छा, एक बार इनको दिखाई दे जाओ, जिससे मैं सच्चा साबित हो जाऊं।"


तब श्याम ने सूरज से कहा, जो पंडित जी को भी अब सुनाई दे रहा था - "सूरज, तुमने मुझे सच्चे मन से याद किया था। तुम्हारा हृदय पवित्र और निश्छल है, इसलिए मैं तुम्हें रोज दिखाई देता हूं। पंडित जी तो रोज सिर्फ अपनी दिनचर्या पूरी करने के लिए औपचारिकता करते हैं। इनसे कहो, अगर ये सच्चे मन से मुझे बुलाएं, तो मैं इनको भी दिखाई दूंगा।"


यह वाणी सुनकर पंडित जी हतप्रभ रह गए। वे अभी तक आश्चर्य से श्याम और सूरज का यह वार्तालाप सुन रहे थे, हालांकि श्याम उन्हें दिख नहीं रहा था।


सूरज ने कहा, "पंडित जी, आप सच्चे मन से श्याम को बुलाओ, वो आपको दिखाई देगा।"


पंडित जी की आंखें खुल गईं। उन्हें अपनी वर्षों की शुष्क, नियम-बद्ध पूजा पर पश्चाताप हुआ। उन्होंने वहीं आंखें बंद कीं, तुरंत सच्चे मन से ईश्वर को याद किया और अपनी गलती के लिए क्षमा मांगी।


अगले ही क्षण, श्याम ने उन्हें भी दर्शन दिए - लेकिन कुछ क्षणों के लिए ही।


उस दिव्य बाल-रूप को देखकर पंडित जी भाव-विभोर हो गए। उनकी आंखों से खुशी और पश्चाताप के आंसू बहने लगे। उन्होंने आगे बढ़कर सूरज के नन्हे पांव पकड़ लिए और गदगद कंठ से बोले -


"गुरु गुड़ ही रहा, और चेला चीनी हो गया!"


सूरज ने शरमाकर अपने पैर छुड़ा लिए। उसने अपने गुरुजी को प्रणाम किया और फिर अपने मित्र श्याम का हाथ पकड़कर अपने घर की ओर चला गया, जबकि पंडित जी उसे जाते हुए देखते रहे - एक ऐसे चेले को, जो भक्ति में अपने गुरु से भी आगे

 निकल गया था।


— समाप्त —

डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली 

vandna.reporter@gmail.com

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