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Showing posts from 2026

अति चिंतन

  कहानी - अति-चिंतन डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली  मंजू आज सुबह से ही बहुत थकी हुई महसूस कर रही थी। वैसे तो उसे नींद बहुत कम आती थी, पर आज तो आंखें खोलने का भी मन नहीं हो रहा था। पति और बच्चों को स्कूल-ऑफिस भेजकर वह बिस्तर पर जा गिरी और गिरते ही उसे नींद आ गई। बेड के ठीक सामने दीवार पर घड़ी टंगी थी। हर दस मिनट में उसकी आंख खुलती। घड़ी देखती और मन में चिंता शुरू - "अभी तो कपड़े धोने हैं, दोपहर का खाना बनाना है, बच्चों को स्कूल से लाने जाना है। मैं ऐसे कैसे सो सकती हूँ।" बस घड़ी देखती और फिर सो जाती। ऐसा पाँच-छह बार हुआ। नींद में भी उसका दिमाग शांत नहीं था। वह खुद से ही कह रही थी, "आज मुझे क्या हो गया है? इतनी नींद क्यों आ रही है? कहीं मुझे कोई बीमारी तो नहीं हो गई? इतना सारा काम पड़ा है।" अचानक उसकी आंख खुली। वह हड़बड़ाकर रसोई में काम करने गई ही थी कि पेट में एक तेज दर्द उठा। वह फिर से बेड पर आकर लेट गई। उसने धीरे से पेट को छूकर देखा कि दर्द कहाँ हो रहा है, तो उसे पेट में बाईं ओर कुछ ठोस सा महसूस हुआ। बस, यहीं से उसके अति-चिंतन की असली उड़ान शुरू हो गई। उसे डर लगने लगा। म...

शीनू की मंजिल

  कहानी - शीनू की मंज़िल शीनू इस वर्ष शहर की नृत्य प्रतियोगिता में प्रथम आई थी। उसकी आँखों में बड़े सपने तैर रहे थे। तभी मुम्बई से एक बड़े रियलिटी शो के लिए ऑफर आया। शीनू ने बारहवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी और अपना सारा फोकस नृत्य अभ्यास पर लगा दिया। छह माह की कड़ी मेहनत के बाद उसका चयन मुम्बई शो के लिए हो गया। शीनू खुशी से फूली नहीं समा रही थी। अपने दोस्तों के साथ वह छह महीने के लिए मुम्बई चली गई। वहाँ उसने बहुत संघर्ष किया। बारह-बारह घंटे तक बिना खाए-पिए अभ्यास किया। पैरों में छाले पड़े, कई बार शारीरिक चोट भी लगी, पर उसने हार नहीं मानी। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। सेमीफाइनल में ही वह प्रतियोगिता से बाहर हो गई। बोझिल मन से वह अपने घर दिल्ली वापस आ गई। उसका एक पूरा साल यूं ही बेकार हो गया। इसका उसे बहुत दुःख था। वह रातों को छत पर अकेली बैठकर सोचती - क्या मेरा सपना यहीं टूट जाएगा? शीनू के पापा एक बैंक में गार्ड की नौकरी करते थे। उनकी तनख्वाह सीमित थी। मम्मी को थैलेसीमिया नामक गंभीर बीमारी थी, जिसकी दवा में ही घर का बड़ा खर्च निकल जाता था। शीनू की दो बड़ी बहनें थीं - प्रिया और सी...

गुरु गुड़ ही रहा चेला चीनी हो गया

  कहानी -गुरु गुड़ ही रहा, चेला चीनी हो गया लेखिका डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली  अक्टूबर का महीना था। सुबह-शाम की हवा में हल्की ठंडक घुलने लगी थी। सूरज अभी-अभी क्षितिज के पार से झांका था और उसकी सुनहरी किरणें नदी के शांत जल पर तैर रही थीं। नदी के किनारे एक पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर पंडित रामशरण बैठे थे। माथे पर चंदन का तिलक, चेहरे पर तेजस्वी आभा। वे अभी-अभी सूर्य को अर्घ्य देकर लौटे थे। उन्होंने अपनी पोटली से शालिग्राम के काले, चमकीले पत्थर को बड़े यत्न से निकाला, नदी के जल से उन्हें स्नान कराया और फिर चबूतरे पर एक साफ कपड़े पर विराजमान किया। उन्होंने आंखें बंद कीं, कुछ मंत्र पढ़े, प्रार्थना की और फिर अपने झोले से निकालकर भोग लगाया। अंत में थोड़ा प्रसाद स्वयं ग्रहण किया। यह सब क्रिया कुछ दूरी पर खड़ा एक बारह वर्षीय बालक बड़ी उत्सुकता से देख रहा था। उसका नाम सूरज था। मैली-कुचैली धोती, नंगे पांव, लेकिन आंखों में गजब की चमक। वह कई दिनों से पंडित जी को यह सब करते देख रहा था। आज उसकी जिज्ञासा रोक न सकी। वह धीरे-धीरे पंडित जी के पास गया, उसने दण्डवत प्रणाम किया और भोलेपन से बोला, "पंड...

अलमारी

  सुबह के साढ़े सात बजे थे। रीना ने अदरक वाली चाय बनाकर रवि को थमाई और बहुत हिम्मत जुटाकर बोली, "सुनो, मुझे एक छोटी सी अलमारी चाहिए। मेरा कॉस्मेटिक का सामान, क्रीम-पाउडर, पर्स सब बेड पर इधर-उधर बिखरे रहते हैं। एक छोटी सी दराज वाली अलमारी आ जाएगी तो सब संभल जाएगा।" रवि ने अखबार से नजर हटाए बिना ही जवाब दिया, "कोई अलमारी-वलमारी नहीं आएगी। पैसे क्या पेड़ पर उग रहे हैं? तुम तो बस खर्चा करना जानती हो, पैसा कमाने की तो कभी सोचती नहीं। जैसा चल रहा है, वैसा चलने दो।" कहकर वह जूते पहनकर ऑफिस चला गया। दरवाजे के बंद होने की आवाज रीना के सीने में जाकर लगी। वह चुपचाप सिंक के पास आई और रात के जूठे बर्तन मांजने लगी। नल से पानी बह रहा था और उसकी आंखों से आंसू। मन में एक पुराना हिसाब चलने लगा। "हम इतने गरीब भी नहीं हैं, जितना मुझे बनाकर रखा गया है। खुद के लिए तो इनके पास सब कुछ है। महंगा परफ्यूम, हेयर जेल, डियो, पाउडर। पिछले महीने ही पांच हजार की शर्ट ली थी। पांचों उंगलियों में महंगी अंगूठियां चमक रही हैं। दोस्तों के साथ होटल में हजारों उड़ा देंगे। लेकिन मेरे लिए एक दो हजार की ...

करवा चौथ की शॉपिंग

  करवा चौथ की शॉपिंग सिया बालकनी में खड़ी होकर अपने पति को ऑफिस जाते हुए देख रही थी। सुबह की हल्की धूप उसके चेहरे पर पड़ रही थी। उसने हाथ हिलाकर मुस्कुराते हुए बाय कहा। तभी साथ वाले फ्लैट की पड़ोसन अपनी बालकनी में आई और चहकते हुए बोली, "सिया, इधर देखो! मैंने तो करवा चौथ की शॉपिंग कर ली। मेरे पति ने मुझे कितनी सुंदर लाल साड़ी दिलवाई है। देखो, इसका बॉर्डर कितना प्यारा है। बस इसकी मैचिंग का चूड़ी सेट और नेकलेस लाना बाकी है। तुम क्या पहनोगी इस बार?" सिया ने तारीफ में कहा, "बहुत सुंदर है, तुम पर बहुत जचेगी।" फिर बात को टालते हुए हंसकर कहा, "मैं? मैं पहन लूंगी कुछ भी। अलमारी में रखा कोई अच्छा सूट पहन लूंगी। नई साड़ी तो बहुत महंगी पड़ेगी।" तभी उसकी एक और सहेली वहां आ गई और मजाक बनाते हुए बोली, "हमारे यहां तो हर साल नए कपड़े पहनते हैं करवा चौथ पर। साल भर का त्योहार है। साल में एक ही बार आता है। सही से तैयार होना चाहिए। तुम इंस्टाग्राम पर रील्स नहीं देखती? कितनी सुंदर-सुंदर तैयार होती हैं महिलाएं।" सिया ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, "हां, वो तो है। दे...

आधुनिकता

  लघु कथा- आधुनिकता / भाषा का पतन ममता स्कूल से घर आ रही थी पढ़ाकर। रास्ते में उसने दो बच्चों को मारपीट करते देखा। यही 12-13 साल उम्र रही होगी। उसके अंदर गुरु का भाव जागा। उसने आगे बढ़कर बच्चों को अलग किया और प्रेम से रहने का संस्कार देने लगी। उनमें से एक बच्चा - "मैडम आप हम दोनों के बीच में मत बोलो, यह हमारा आपसी मामला है। आपका काम स्कूल में सिलेबस पूरा कराना है। ज्ञान मत दो हमें। अपने काम से काम रखो।" ममता अवाक सी खड़ी रह गई। भरी भीड़ में वह बच्चा उसके सम्मान की धज्जियां उड़ा गया। किसी ने कुछ कहना भी जरूरी न समझा। ममता ने खुद को संयत करते हुए कदम अपने घर की ओर बढ़ा दिए। दिमाग में विचारों का तूफान चल रहा था। आधुनिकता की कीमत समाज को ऐसे चुकानी पड़ रही है। यह आधुनिकता है अपने गुरु का अपमान। क्या है इनका भविष्य? डॉ वंदना शर्मा नई  दिल्ली 

संघर्ष अभी जारी है

  कहानी - संघर्ष अभी जारी है. जब कोई साथ न दे, जब कोई बात न सुने तब एक ही चेहरा सामने आता है मेरी प्यारी बहन का। जो मेरी सबसे अच्छी, सच्ची दोस्त है। क्योंकि उसके सामने बोलने के लिए कुछ सोचना नहीं पड़ता। वो मेरी बातों को तुरंत जज नहीं करती। वो बातों के पीछे छुपे दर्द को भी समझती है और उस दर्द को भी जिसे कहने के लिए शब्द नहीं मिलते। मेरी बहन विन्नी बहुत ही सुलझे विचारों की, दूरदर्शी और बहुत ही यथार्थवादी दृष्टिकोण रखती है। उसके पास हर समस्या का समाधान रहता है। उसे रिश्तों की भीड़ नहीं अकेलापन पसंद है। उसे अकेले में खुश रहना अच्छी तरह आता है। अपनी फिटनेस का भी ध्यान रखती है। रोज एक घण्टे योग, एक घण्टे डांस क्लास, दो घण्टे ट्यूशन पढ़ाती है। उसका एक ही उसूल है "किसी के पीछे मत भागो, जो तुम्हारा है वो खुद आयेगा तुम्हारे पास।" जब मैं दुःखी या निराश होती हूँ तो वह मुझे सुनती है, ज्ञान नहीं देती। उसके शब्द मुझे प्रोत्साहित करते हैं। सही निर्णय लेने में सहायता करते हैं। अपनी जिंदगी में अगर यह पता हो हमें करना क्या है, हमें चाहिए क्या, और कैसे करना है तो जिंदगी आसान हो जाती है। मेरी बहन...

सादगी

  सादगी अनु कोई असाधारण नाम नहीं था, और वह खुद भी खुद को असाधारण नहीं मानती थी। वह एक साधारण सी, सुलझे विचारों वाली लड़की थी। उसे सजने-संवरने का शौक नहीं था। उसके लंबे-ढीले सूट, करीने से ओढ़ा हुआ दुपट्टा और भीतर की रोशनी से दमकता आभापूर्ण चेहरा ही उसे भीड़ में अलग पहचान दे देता था। वह 'सादा जीवन, उच्च विचार' में सचमुच विश्वास करती थी। गणित में वह प्रतिभा का परचम लहराती थी। उसकी कोई खास सहेली नहीं थी, पर वह सबसे बोलती थी, सबकी चुपचाप सहायता करती थी, और फिर भी अपने आप में अकेली ही रहती थी। उसे इधर-उधर की चुगली, दिखावा, ईर्ष्या, इन सबसे सख्त नफरत थी। खाली समय में वह कॉलेज की लाइब्रेरी में किताबों के बीच मिलती। इसीलिए कॉलेज में सभी उसका मन से सम्मान करते थे। वाद-विवाद हो, भाषण हो या काव्य-पाठ, हर प्रतियोगिता में वह प्रथम आती थी। उसकी जीत में कभी अहंकार नहीं होता था, बस एक शांत मुस्कान होती थी। एक दिन विद्यालय में घोषणा हुई, 'मिस फेवरेट क्वीन' प्रतियोगिता होगी। जीतने वाली को पचास हजार रुपये का पुरस्कार मिलेगा। पूरे विद्यालय में हलचल मच गई। सभी लड़कियों ने बढ़-चढ़कर अपने नाम ...

भाग्य

  कहानी - भाग्य सोहन एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर था। उसकी पत्नी सुधा, पढ़ी-लिखी, समझदार और सुलझे विचारों वाली महिला थी। शादी के बाद जब बेटा हुआ, तो सुधा ने एक बड़ा फैसला लिया। उसने कहा, "सोहन, अभी बच्चे को मेरी सबसे ज्यादा जरूरत है। नौकरी तो बाद में भी मिल जाएगी, पर उसके बचपन के ये साल लौटकर नहीं आएंगे।" सोहन मान गया। सुधा ने पूरी तरह खुद को घर को समर्पित कर दिया। सवेरे से रात तक वही रसोई, वही होमवर्क, वही बच्चे के साथ खेलना, कहानियां सुनाना। धीरे-धीरे उसने आईने में देखना बंद कर दिया। खुद पर ध्यान देने का समय ही कहां था? वर्षों की इस तपस्या में उसका वजन काफी बढ़ गया, चेहरा थकान से भर गया, पर मन ममता से भरा था। उधर सोहन तरक्की की सीढ़ियां चढ़ता गया। कंपनी के काम से वह हफ्तों बाहर रहने लगा। घर एक होटल जैसा लगने लगा, जहां वह सिर्फ बैग बदलने आता था। सुधा का बेटा अब बारह साल का हो चुका था। समझदार हो गया था। एक दिन सुधा ने आईने में खुद को देखा और चौंक गई। उसने सोचा, अब बेटा बड़ा हो गया है, सोहन भी घर पर कम ही रहता है, मुझे अब अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देना चाहिए। उसने योग क्ल...

नन्ही चिड़िया

  कहानी - नन्ही चिड़िया रिया को लोग प्यार से 'नन्ही चिड़िया' कहते थे। अनाथ थी वह, माँ-बाप का साया बचपन में ही उठ गया था, पर उसकी आँखों में सपनों की चमक कभी कम नहीं हुई। उसे अपना घर चाहिए था, अपनी छत, अपनी छोटी-सी दुनिया, जिसे वह तिनका-तिनका जोड़कर खुद बनाना चाहती थी। इसके लिए वह दिन-रात मेहनत करती थी। उसके चेहरे पर न बनावटी मेकअप होता, न बातों में चालाकी, बस एक निश्छल सच्चाई थी जो पहली नजर में ही मन को छू जाती थी। एक दिन वह शहर की एक बड़ी कंपनी में साक्षात्कार देने गई। कंपनी का सीईओ एक युवा था, पिछले महीने ही विदेश से पढ़ाई पूरी कर लौटा था। तेज दिमाग, बड़ी सोच, पर दिल से अभी कच्चा, दुनिया की छल-कपट से अनजान। जब रिया केबिन में आई, तो वह उसे देखता ही रह गया। उसने अब तक इतनी मासूम लड़की नहीं देखी थी। उसकी आँखों में न कोई लालच था, न कोई दिखावा। वह उसकी सादगी से भीतर तक प्रभावित हो गया। उसने उसी क्षण तय कर लिया, ऐसी लड़की कंपनी में होनी चाहिए। रिया को नौकरी मिल गई। पर उसके मन में एक और परीक्षा चल रही थी। वह एक महीने तक चुपचाप रिया को देखता रहा। उसने पाया, रिया कभी झूठ नहीं बोलती, कभ...