शीनू की मंजिल
कहानी - शीनू की मंज़िल
शीनू इस वर्ष शहर की नृत्य प्रतियोगिता में प्रथम आई थी। उसकी आँखों में बड़े सपने तैर रहे थे। तभी मुम्बई से एक बड़े रियलिटी शो के लिए ऑफर आया। शीनू ने बारहवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी और अपना सारा फोकस नृत्य अभ्यास पर लगा दिया।
छह माह की कड़ी मेहनत के बाद उसका चयन मुम्बई शो के लिए हो गया। शीनू खुशी से फूली नहीं समा रही थी। अपने दोस्तों के साथ वह छह महीने के लिए मुम्बई चली गई। वहाँ उसने बहुत संघर्ष किया। बारह-बारह घंटे तक बिना खाए-पिए अभ्यास किया। पैरों में छाले पड़े, कई बार शारीरिक चोट भी लगी, पर उसने हार नहीं मानी।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। सेमीफाइनल में ही वह प्रतियोगिता से बाहर हो गई। बोझिल मन से वह अपने घर दिल्ली वापस आ गई। उसका एक पूरा साल यूं ही बेकार हो गया। इसका उसे बहुत दुःख था। वह रातों को छत पर अकेली बैठकर सोचती - क्या मेरा सपना यहीं टूट जाएगा?
शीनू के पापा एक बैंक में गार्ड की नौकरी करते थे। उनकी तनख्वाह सीमित थी। मम्मी को थैलेसीमिया नामक गंभीर बीमारी थी, जिसकी दवा में ही घर का बड़ा खर्च निकल जाता था। शीनू की दो बड़ी बहनें थीं - प्रिया और सीमा।
प्रिया फैशन डिजाइनर थी। उसने अपने कॉलेज के ही एक लड़के से लव मैरिज कर ली थी। लड़का बहुत अच्छा था, बढ़िया कमाता था, पटना में उसका अपना घर था और सबसे बड़ी बात, वह प्रिया के लिए बहुत वफादार था। प्रिया की पढ़ाई का खर्च भी वही उठा रहा था। घरवालों ने कोई विरोध नहीं किया। बिना तामझाम के, कम बजट में एक मंदिर में कुछ परिवार वालों के सामने प्रिया का विवाह सम्पन्न हो गया। प्रिया आज सुखी थी।
मंझली बहन सीमा पुलिस अधिकारी की तैयारी कर रही थी। ट्रेनिंग के दौरान उसे अपने सीनियर अधिकारी से प्रेम हो गया। जब तक सीमा की सरकारी नौकरी नहीं लगी, उसने अपने मंगेतर से समय मांगा था। नौकरी लगते ही उन दोनों ने कोर्ट मैरिज कर ली।
शीनू के मम्मी-पापा बहुत खुश थे। वे खुद को भाग्यशाली मानते थे कि बिना दहेज और बिना खर्च किए उन्हें इतने शालीन और कमाऊ दामाद मिले हैं। उन्हें अब चिंता थी तो बस सबसे छोटी शीनू की।
एक तो शीनू मांगलिक थी, और छोटी होने के कारण थोड़ी जिद्दी भी। मुम्बई से लौटकर उसने दिल्ली में ही एक छोटी सी नृत्य अकादमी खोल ली। वह मोहल्ले की लड़कियों को नृत्य सिखाने लगी। साथ में उसने जुम्बा और योगा का एक वर्षीय डिप्लोमा भी ले लिया। लेकिन यह कार्य स्थायी आय का स्रोत नहीं था। महीने में कभी दो हजार आते, कभी पाँच हजार। किसी भी अच्छे विद्यालय में नृत्य अध्यापिका बनने के लिए डिग्री का होना जरूरी होता है।
शीनू ने हिम्मत करके नर्सिंग डिप्लोमा में प्रवेश लिया, लेकिन उसमें भी उसका मन नहीं लगा। वह व्यक्तिगत रूप से महिलाओं को नृत्य और योग की कक्षाएं देती रही।
अपनी बहनों की तरह शीनू की किस्मत अच्छी नहीं थी। उसे भी जीवन में दो बार किसी पुरुष साथी के प्रति आकर्षण हुआ, लेकिन कोई भी उसे विश्वसनीय नहीं लगा। किसी ने उसके संघर्ष का मजाक उड़ाया, तो किसी ने उसके सपनों का ।थक-हार कर शीनू ने लव मैरिज का इरादा ही छोड़ दिया।
फिर उसने अपनी छूटी हुई पढ़ाई को फिर से शुरू करने का निश्चय किया। धीरे-धीरे उम्र खिसकती जा रही थी। अब शीनू 26 साल की हो गई थी। उसकी लंबाई कम थी, वह दुबली थी, तो अब भी 16 साल की बच्ची जैसी ही लगती थी। उसने एक कन्या महाविद्यालय में बी.ए. डिग्री के लिए प्रवेश ले लिया। कॉलेज में वह सबसे उम्रदराज छात्रा थी, पर उसने शर्म को अपने आड़े नहीं आने दिया।
इसी बीच शीनू के माँ-बाप ने शीनू की कुण्डली बनवाई। एक ज्योतिषी ने उन्हें डरा ही दिया। बोला - "शीनू के हाथ में विवाह का योग बहुत कम है। तीस साल के बाद योग बन रहा है, लेकिन उसका भी लम्बा चलना मुश्किल है।" कुछ उपाय भी बताए, लेकिन शीनू का मन उदास हो गया।
एक तो उसकी दोनों बहनें लव मैरिज करके सुखी जीवन जी रही थीं, और दूसरा उसकी पढ़ाई भी पूरी नहीं हुई थी। सच कहें तो शुरू में शीनू के मम्मी-पापा ने भी थोड़ी लापरवाही की थी। उन्हें लगता था, अगर शीनू की शादी हो गई तो उन्हें कौन करके खिलाएगा, बीमार माँ की सेवा कौन करेगा।
जब शीनू 28 की हो गई, तब उन्हें चिंता सताने लगी। समाज के ताने सुनकर उन्होंने एक परिचित के बताए रिश्ते पर बात चलाई। बिहार में एक सरकारी अध्यापक का रिश्ता था, लेकिन वे दहेज में दस लाख रुपए मांग रहे थे।
शीनू को लड़का पसंद भी था। वह सुलझा हुआ, शांत स्वभाव का था। लेकिन शीनू ने एक शर्त रखी - "जब मेरी पढ़ाई पूरी हो जाएगी, तभी मैं शादी करूंगी।" उसने लड़के से कहा - "क्या आप मेरे लिए इतना इंतजार कर सकते हैं?" लड़के ने कहा - "हाँ, मैं तुम्हारे सपनों की इज्जत करता हूँ, मैं इंतजार करूंगा।" शीनू शादी के लिए तभी तैयार थी जब वह अपने पैरों पर खड़ी हो जाए।
शीनू ने दिन-रात एक कर दिया। कॉलेज, अकादमी और घर - तीनों को संभालते हुए उसने अपनी डिग्री पूरी कर ली। डिग्री पूरी होते ही उसे एक प्राइवेट स्कूल में नृत्य शिक्षिका की जॉब मिल गई। अब वह सरकारी नौकरी की तैयारी करना चाहती थी। लेकिन घरवालों ने जल्दबाजी में उसी लड़के से उसकी शादी कर दी।
विदाई के समय शीनू रोई नहीं। उसने अपने पति को साफ-साफ बता दिया था - "मेरी पहली प्राथमिकता मेरा कैरियर है, मेरे माता-पिता की जिम्मेदारी है। क्या आप मेरा साथ देंगे?" उसके पति ने उसका हाथ थामकर कहा - "शीनू, मैंने तुम्हारे जिद्दीपन से ही प्रेम किया है। मैं तुम्हारे हर सपने में तुम्हारे साथ हूँ।"
शादी के बाद भी शीनू ने पढ़ाना नहीं छोड़ा। सुबह वह स्कूल जाती, शाम को प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करती। उसका पति रात को उसके लिए चाय बनाता, उसके नोट्स ठीक करता।
और फिर एक दिन, वह दिन आया जिसका शीनू को वर्षों से इंतजार था। डाकिया एक सरकारी लिफाफा लेकर आया। शीनू का चयन सरकारी विद्यालय में वरिष्ठ नृत्य प्रशिक्षक के पद पर हो गया था।
उस दिन शीनू की आँखों में आँसू थे - ये हार के नहीं, जीत के आँसू थे। मुम्बई के उस सेमीफाइनल में हारी हुई लड़की आज जिंदगी के फाइनल में जीत गई थी।
शीनू ने सिद्ध कर दिया था कि कुण्डली में विवाह का योग हो या न हो, मेहनत और सच्चे साथी के योग से हर मंजिल मिल ही जाती है।
*शिक्षा:* देर से ही सही, पर अपने सपनों को कभी मत छोड़ो। सही जीवनसाथी वह नहीं जो तुम्हें रोक दे, बल्कि वह है जो तुम्हें उ
ड़ने के लिए आसमान दे।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
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