नन्ही चिड़िया

 

कहानी - नन्ही चिड़िया


रिया को लोग प्यार से 'नन्ही चिड़िया' कहते थे। अनाथ थी वह, माँ-बाप का साया बचपन में ही उठ गया था, पर उसकी आँखों में सपनों की चमक कभी कम नहीं हुई। उसे अपना घर चाहिए था, अपनी छत, अपनी छोटी-सी दुनिया, जिसे वह तिनका-तिनका जोड़कर खुद बनाना चाहती थी। इसके लिए वह दिन-रात मेहनत करती थी। उसके चेहरे पर न बनावटी मेकअप होता, न बातों में चालाकी, बस एक निश्छल सच्चाई थी जो पहली नजर में ही मन को छू जाती थी।


एक दिन वह शहर की एक बड़ी कंपनी में साक्षात्कार देने गई। कंपनी का सीईओ एक युवा था, पिछले महीने ही विदेश से पढ़ाई पूरी कर लौटा था। तेज दिमाग, बड़ी सोच, पर दिल से अभी कच्चा, दुनिया की छल-कपट से अनजान।


जब रिया केबिन में आई, तो वह उसे देखता ही रह गया। उसने अब तक इतनी मासूम लड़की नहीं देखी थी। उसकी आँखों में न कोई लालच था, न कोई दिखावा। वह उसकी सादगी से भीतर तक प्रभावित हो गया। उसने उसी क्षण तय कर लिया, ऐसी लड़की कंपनी में होनी चाहिए। रिया को नौकरी मिल गई।


पर उसके मन में एक और परीक्षा चल रही थी। वह एक महीने तक चुपचाप रिया को देखता रहा। उसने पाया, रिया कभी झूठ नहीं बोलती, कभी कामचोरी नहीं करती। पैसों के मामले में वह एकदम खरी थी। फाइलों में एक रुपया भी इधर-उधर नहीं होता था।


एक माह बाद उसने रिया को केबिन में बुलाया। रिया घबराई हुई आई, उसे लगा शायद कोई भूल हो गई है। पर युवा सीईओ ने मुस्कुराकर कहा, "रिया, क्या तुम जीवन भर के लिए मेरी साथी बनोगी? क्या तुम मुझसे विवाह करोगी?"


रिया स्तब्ध रह गई। यह प्रस्ताव उसके लिए किसी सपने के सच होने जैसा था। उसकी आँखें भर आईं और उसने हाँ कह दिया।


पर रिया ने विवाह से पहले एक शर्त रखी, "मैं नौकरी नहीं छोडूंगी।" उसका मानना था कि स्त्री को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना चाहिए। उसे अपनी छोटी-छोटी जरूरतों के लिए भी किसी के आगे हाथ फैलाना स्वीकार नहीं था, पति करोड़पति ही क्यों न हो। उसका स्वाभिमान ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी थी।


युवक ने सम्मान से उसका हाथ थाम लिया, "ठीक है मेरी नन्ही चिड़िया, तुम उड़ना बंद मत करना। तुम्हारे पंखों को मैं कभी नहीं काटूंगा।"


विवाह के बाद जैसे रिया के शुभ कदम पड़े। कंपनी का टर्नओवर दिन-दोगुना बढ़ने लगा। लोग कहने लगे, बहू लक्ष्मी के रूप में आई है। पति ने गर्व से रिया को कंपनी की डायरेक्टर बना दिया। अब एक तेज दिमाग और एक ईमानदार दिल मिलकर व्यवसाय को नई ऊंचाइयों पर ले जाने लगे।


दो वर्ष बाद उनके घर किलकारी गूंजी। बेटा हुआ, नाम रखा गया आर्यन। पैसा, बंगला, गाड़ी सब कुछ था, पर रिया नहीं चाहती थी कि उसका बेटा सोने के पिंजरे में पले। वह उसे साधारण परवरिश देना चाहती थी, ताकि उसमें अहंकार न आए और वह पैसे का मूल्य समझे।


रिया ने आर्यन को एक सरकारी स्कूल में दाखिला दिलाया। घर पर ही उसकी पढ़ाई की व्यवस्था की। अनुशासन और प्रकृति के सानिध्य में आर्यन बड़ा होने लगा। शाम को रिया उसे बगीचे में बैठकर कहानियां सुनाती, "बेटा, देखो उस चिड़िया को, कैसे तिनका-तिनका जोड़कर अपना घोंसला बनाती है। मेहनत से ही चरित्र बनता है, महलों से नहीं।"


पढ़ाई पूरी होने पर रिया और उसके पति ने आर्यन को दो वर्ष के लिए देश-भ्रमण और तीर्थ-यात्रा पर भेज दिया। वह साधुओं के साथ रहा, किसानों के साथ खेतों में काम किया, नदियों के किनारे बैठकर जीवन को समझा। दो साल बाद जब वह लौटा, तो वह पच्चीस वर्ष का एक परिपक्व, दयालु और संवेदनशील युवक बन चुका था।


एक सुबह आर्यन अपने बगीचे में पौधों को पानी दे रहा था। तभी उसकी नजर एक घायल नन्ही चिड़िया पर पड़ी। उसके नाजुक पंख से रक्त बह रहा था। आर्यन का हृदय करुणा से भर गया। उसने उसे धीरे से हथेलियों में उठाया, उसके घाव पर हल्दी का लेप लगाया और उसे एक नरम डिब्बे में रखकर घर ले आया। सारा दिन वह उसकी सेवा में लगा रहा।


रात गहरी हुई तो एक अद्भुत घटना घटी। वही नन्ही चिड़िया धीरे-धीरे एक अति सुंदर कन्या में बदल गई। चांदनी जैसी कांति, आँखों में कृतज्ञता के आँसू। आर्यन आश्चर्य से उसे देखता रह गया।


वह मुस्कुराई, "डरो मत आर्यन। मैं परियों के लोक की राजकुमारी हूँ। पृथ्वी का सौंदर्य देखने आई थी। खेल-खेल में मेरे हाथ की जादुई अंगूठी कहीं गिर गई। उसी के बिना मैं वापस नहीं जा सकती। दिन में मैं चिड़िया बनकर उसे खोजने का प्रयास करूंगी। तुमने मुझे आज जहाँ पाया था, कल वहीं ले चलना। यदि अंगूठी मिल जाए तो रात में उसे मेरे पैर में पहना देना।"


अगले दिन आर्यन उसे उसी बगीचे में ले गया। दोनों ने मिलकर घास-पत्तियों के बीच खोजा। सौभाग्य से, एक गुलाब की झाड़ी के नीचे वह अंगूठी चमकती हुई मिल गई।


रात को आर्यन ने वह अंगूठी श्रद्धा से उसके पैर में पहना दी। पहनाते ही उसके चारों ओर सुनहरी रोशनी फैल गई। राजकुमारी ने कहा, "तुमने निस्वार्थ भाव से मेरी सहायता की। मांगो, तुम्हें क्या वरदान दूं?"


आर्यन ने हाथ जोड़ दिए, "मुझे कुछ नहीं चाहिए राजकुमारी। मेरी माँ ने सिखाया है कि निस्वार्थ सेवा ही सबसे बड़ा पुण्य है, उसका कोई मूल्य नहीं मांगा जाता।"


राजकुमारी की आँखें छलछला आईं। इतने दिनों में उसने आर्यन की दयालुता, उसकी सादगी, पौधों से बातें करना, चींटियों को शक्कर डालना सब देखा था। उसे धरती के इस युवक से प्रेम हो गया था।


आर्यन ने भी धीरे से अपने हृदय की बात कही, "पर यदि तुम देना ही चाहती हो, तो क्या तुम मेरा एक निवेदन स्वीकार करोगी? क्या तुम अपने जादुई लोक को छोड़कर, इस धरती पर, मेरे साथ, मेरी नन्ही चिड़िया बनकर नहीं रह सकतीं?"


एक क्षण सन्नाटा रहा। फिर राजकुमारी ने अपना हाथ आर्यन के हाथ में दे दिया। उसने अपने लोक के सुख से अधिक इस धरती के सच्चे प्रेम को चुना।


जब रिया ने यह सुना, तो उसकी आँखें खुशी से भर आईं। उसने बहू का स्वागत अपने बगीचे के ताजे फूलों और आरती के थाल से किया। उसने उसके माथे को चूमा और कहा, "देखा बेटा, नन्ही चिड़िया आखिर अपना घोंसला खुद ही चुनती है।"


और फिर उस बगीचे वाले घर में दो पीढ़ियों की दो नन्ही चिड़ियाएं एक साथ रहने लगीं, एक जिसने तिनका-तिनका जोड़कर अपना संसार बनाया था, और दूसरी जिसने प्रेम के लिए आसमान छोड़कर धरती को

 अपना घर बना लिया था।

डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली 

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