भाग्य

 

कहानी - भाग्य


सोहन एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर था। उसकी पत्नी सुधा, पढ़ी-लिखी, समझदार और सुलझे विचारों वाली महिला थी। शादी के बाद जब बेटा हुआ, तो सुधा ने एक बड़ा फैसला लिया। उसने कहा, "सोहन, अभी बच्चे को मेरी सबसे ज्यादा जरूरत है। नौकरी तो बाद में भी मिल जाएगी, पर उसके बचपन के ये साल लौटकर नहीं आएंगे।"


सोहन मान गया। सुधा ने पूरी तरह खुद को घर को समर्पित कर दिया। सवेरे से रात तक वही रसोई, वही होमवर्क, वही बच्चे के साथ खेलना, कहानियां सुनाना। धीरे-धीरे उसने आईने में देखना बंद कर दिया। खुद पर ध्यान देने का समय ही कहां था? वर्षों की इस तपस्या में उसका वजन काफी बढ़ गया, चेहरा थकान से भर गया, पर मन ममता से भरा था।


उधर सोहन तरक्की की सीढ़ियां चढ़ता गया। कंपनी के काम से वह हफ्तों बाहर रहने लगा। घर एक होटल जैसा लगने लगा, जहां वह सिर्फ बैग बदलने आता था।


सुधा का बेटा अब बारह साल का हो चुका था। समझदार हो गया था। एक दिन सुधा ने आईने में खुद को देखा और चौंक गई। उसने सोचा, अब बेटा बड़ा हो गया है, सोहन भी घर पर कम ही रहता है, मुझे अब अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देना चाहिए। उसने योग क्लास जॉइन की, पर चार दिन में ही मन उखड़ गया। बाहर की भीड़-भाड़ उसे रास नहीं आती थी। उसे सुकून मिलता था अपने छोटे से बगीचे में। वहीं वह घंटों बिताती। कभी पौधों को पानी देती, कभी निराई-गुड़ाई करती। उसने बगीचे में भिंडी, टमाटर, धनिया, पालक, न जाने कितनी सब्जियां लगा रखी थीं। वह बगीचा ही उसकी दुनिया, उसकी दोस्त, उसकी साधना थी।


इसी बीच सोहन की जिंदगी में एक तूफान आया। चूंकि वह अधिकतर बाहर रहता था, उसकी नजदीकियां उसी की कंपनी में काम करने वाली एक युवती से बढ़ गईं। वह रोज सज-धज कर ऑफिस आती थी, तेज परफ्यूम लगाती थी, मीठी-मीठी बातें करती थी। सोहन को उसका चमक-दमक भरा साथ सुधा की सादगी से ज्यादा आकर्षक लगने लगा। वह धीरे-धीरे घर से दूर होता गया।


एक दिन सुधा को सब पता चल गया। उसका दिल टूट गया, पर उसने हिम्मत नहीं हारी। उसने सोहन को बहुत समझाया, "सोहन, ये बाहरी चमक क्षणिक है। हमारा बारह साल का साथ, हमारा बेटा, हमारा घर, क्या इनका कोई मोल नहीं?" पर सोहन पर मोह का पर्दा पड़ा था। उसने एक न सुनी और एक दिन बैग उठाकर सुधा को छोड़कर उस सहकर्मी के घर रहने चला गया। सुधा अकेली रह गई, पर टूटी नहीं। उसने अपने बेटे को सीने से लगाया और अपने बगीचे को और भी प्यार से सींचने लगी।


और फिर भाग्य ने खेल दिखाया। जैसे ही सोहन ने सुधा का साथ छोड़ा, उसकी किस्मत रूठ गई। कंपनी में घोटाले का आरोप लगा और उसकी नौकरी चली गई। वह बेरोजगार हो गया। एक साल तक वह दर-दर भटका, कहीं नौकरी नहीं लगी। जिस चमक के पीछे वह भागा था, वह भी अंधेरा देखकर उसे छोड़कर चली गई। उसकी वह दोस्त भी उसे छोड़ गई।


टूटा, हारा, भूखा सोहन एक रात पुराने घर के दरवाजे पर खड़ा था। आंखों में आंसू थे। सुधा ने दरवाजा खोला। सोहन उसके पैरों में गिर पड़ा, "मुझे माफ कर दो सुधा, मुझे अपने किए पर बहुत पछतावा है।"


सुधा की आंखें भी भर आईं। उसने उसे उठाकर गले लगा लिया। उसने कहा, "जो हुआ सो हुआ। यह तुम्हारा ही घर है।" सुधा ने उसे सच्चे मन से माफ कर दिया।


और यह चमत्कार ही था। सुधा के माफ करते ही सोहन के फोन पर घंटी बजी। एक बड़ी कंपनी से मेल आया था, उसकी नियुक्ति हो गई थी। एक साल से बंद पड़े भाग्य के द्वार एक पल में खुल गए।


सोहन की आंखों से आंसू बह निकले। उसने सुधा का हाथ थामकर कहा, "मुझे अब समझ आ गया है सुधा। मेरा भाग्य तुमसे जुड़ा है। तुम मेरी लक्ष्मी हो। तुम्हारा साथ छूटा तो सब छूट गया, तुम्हारे साथ आते ही मेरी नौकरी भी लौट आई। मुझे माफ कर दो। अब हम तीनों हमेशा साथ रहेंगे।"


सुधा मुस्कुरा दी। उसके बगीचे में उस शाम एक नया फूल खिला था, क्षमा का, प्रेम का और सच्चे भाग्य का।


डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली 

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